आपने हिंदी सिनेमा नहीं देखा तो क्या देखा?
ये बड़े बड़े सिनेमा घर और उनके आगे लगे सजीले पोस्टर और उन पर उभर के निकल रहा फिल्म का हीरो. हाथ में बड़ा सा तमंचा और एक नाजुक सी हीरोइन उसके क़दमों पर पड़ी जैसे 'अब बस भी करो' का एक्सप्रेशन दे रही हो. और इर्द गिर्द लगे ढेरो कलाकार, एक शेर, एक कबूतर और कहीं दूर धमाके का धुंआ.
छोटी सी टिकेट खिड़की पे टूटती भीड़. काहे की महिलाओं की अलग लाइन. यहाँ तो मेला लगता है. हाँ वो सिंगल स्क्रीन के ज़माने लद गए. पर मल्टीप्लेक्सों की चकाचौंध से कोई अंदाज़ थोड़े ही बदल गया है. आज भी जब आइटम नंबर पे स्टीरियो साउंड बजता है तो सीटियों के शोर से सिनेमा हाल गूँज उठता है.
फिर वो हीरो की एंट्री! बूट से शुरू होते हुए बड़े इत्मीनान से बेल्ट तक पहुँचती है, फिर गोगल दिखाते हैं, फिर ज़रा हवा से लहलहाते बालों पे इशारा होता है. एक धमाकेदार बैकग्राउंड स्कोर से शकल पे फोकस आता है. फिर चार पांच गाने और बारह पंद्रह पंचेस से जो सिलसिला शुरू होता है और एंड क्रेडिट्स तक चलता है. हो भी क्यों न? भाई पब्लिक पैसा देती है.
अगर हीरो पे सीटी बजती है तो आप हीरोइन को कम मत आंकिये ! हिंदुस्तान के सिनेमा में हीरोइन की हमेशा से ही एक अहम् भूमिका रही है. हीरो को हीरो बनाने वाली हीरोइन, फिल्म में ड्रामा लाने वाली हीरोइन, क्लाइमेक्स की जननी हीरोइन. एक तरह से सारी फिल्म हीरोइन के गुरुत्वाकर्षण से जूडी है. ज़रा सोचिये कैसा लगता जब हीरो अकेला बगीचे में नाच रहा होता.
फिर इनके अलावा रामू काका, इंस्पेक्टर शेखावत, खबरी टोनी ब्रिगेंजा, बिल्डर खुराना, रोडसाइड मवाली पकिया, घर का कुत्ता रॉकी, कामवाली बाई रूपा इन सब का भी बड़ा रोल होता है. अगर हीरो फिल्म की नैया का खिवैया है तो ये लोग उस नैया को तीन घंटे चलने वाली पतवार के सामान है.
और इन्ही सभी फिल्मों से कहीं जिंदा है दर्शकों के सपनों में चलने वाली एक दूसरी दुनिया. काम की भाग दौड़ में हिंदी सिनेमा के रुपहले परदे के ये सितारे और इनकी कहानिया उनके जीवन में एक तरह की एस्केपिज़म देती है. ज़रा सी हीरो की स्टाइल, हीरोइन की वो ड्रेस, दोस्तों के बीच एक ज़बरदस्त डायलोग और बारात में फिल्म के गानों के स्टेप्स... एक फिल्म सिनेमा में ख़तम होने के बाद ख़त्म नहीं होती, वो दर्शक के साथ घर तक आती है और ये ही हिंदी सिनेमा का जादू है.
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