Wednesday, March 13, 2013

उधेड़बुन


जीवन के अविरल पथ पर
कब सांझ ढली कब रात कटी

व्यस्तता के अनंत रथ पर
रिश्तों की पूँजी कहाँ लुटी कहाँ मिटी

अब पिछले पन्ने टटोल रहा हूँ
अपनों का मोल समझ रहा हूँ

उलझन विशेष, विवश मन है
में कल की देहलीज पर कल खोज रहा हूँ

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