उन दिनों पिताजी की
पोस्टिंग जयपुर के पास
के एक छोटे
गावं 'अजीतगढ़' में
थी. टूटी फूटी
गलियों से चल
के हाट बाज़ार
निकलता था. चबूतरे
पर पंगत लगती
थी. दो साल
पुरानी फिल्मों के पोस्टर
चिपके होते थे.
अज़ान की गूँज
पे सारा गाँव
जाग उठता था
और शाम को
कीर्तन की घंटियाँ
कोसों तक सुनाई
देती थी.
ऐसे गावों में बैंक
वालों, एल आई
सी वालों की
बड़ी पूछ होती
है. उन्हें किराये
का मकान सबसे
पहले मिलते है.
पिताजी को भी
एक बड़ी सी
हवेली में एक
बड़ा सा कमरा
बड़े आराम से
किराये पे मिल
गया था. वे
वहां अकेले ही
रहते थे. हम
स्कूल के कारण
जयपुर ही रहते
थे और हमारी
माँ हमारे कारण
जयपुर ही रहती
थी. कभी कभी
छुट्टियाँ होने पे
ही हम वहां
जाते थे.
वहां की सुबह
बड़ी सुन्दर होती
थी. ठंडी हवा
और मिटटी की
खुशबू से नींद
खुला करती थी.
बगीचे में मोर
नाचते देखने को
मिलते थे. अलग
अलग चिड़ियों के
चहकने की आवाजें
आती थी. हवेली
के झरोखों में
खड़े होक सारा
गावं और उसके
साथ लगे बड़े
बड़े खेत दिखाई
देते थे. ये
सुबह अलग होती
थी. न ऑटो
- बस के कर्कश
शोर, न ठेलेवालों
की आवाजें, न
पडोसी के घर
जोर से बजता
टी वी.
पिताजी के साथ
उनकी बैंक जाते
जाते पूरे गावं
से मुलाक़ात होती
थी. किसी ने
रोक के चाय
पिला दी, तो
किसी ने रेवड़ी-मावे की
मिठाई खिलादी, कहीं
शाम के खाने
का न्योता मिल
गया तो कहीं
किसी ने चार
सेब पकड़ा दिए.
किस्से चल पड़े
तो रुकने का
नाम नहीं. वहां
वाकई में डाकिये
दिखाई देते थे.
ऑडियो केसेट सेंटर
में राजस्थानी गाने
बजते थे. बड़े
से पीपल के
पेड़ के नीचे
अम्मा खेत से
तोड़ी ताज़ी सब्जी
बेचती थी और
एक छोटे से
बटुवे में पैसे
रखती थी.
नंगे पेर और
नीली हाफ पेंट
- सफेद बुशट में
बिखरे बालों में
बच्चे स्कूल जाते
दीखते थे. फिर
नज़र उनके स्कूल
पे जाती थी.
कोई फलां फलां
विदध्यालय जहाँ फर्श
पे दस बारह
बच्चे बैठे रट्टा
लगाते रहते थे.
उनको देख स्वयं
के बेहतर होने
की भावना अपने
ही आप मन
में आती थी.
अजी हो भी
क्यों ना हम
शहर वाले जो
ठहरे!
एक अंधरे से हॉल
में बैंक का
ऑफिस था. बाबा
आदम के ज़माने
के पंखे लगे
थे. उन पंखों
से कबूतरों कोई
डर नहीं था.
दोनों ने आपस
में तालमेल बैठा
लिया था. धोती
पगड़ी वाले कस्टमर
आते थे. छोटी
रकम की देन
लेन होती थी.
बड़े आराम से
काम होता था.
कहा जाता है
की गावं का
नाम वहां के
बहुत पुराने एक
राजा पे रखा
गया था- अजित
सिंह. गावं वाले
यह भी कहते
हैं की वह
बड़ा निर्दयी राजा
हुआ करता था.
इसलिए पूरे गावं
में कोई भी
अपने बच्चे का
नाम अजित नहीं
रखता है.
शाम का अँधेरा
जल्दी होता था.
अक्सर बिजली चली
जाया करती थी.
सारा गावं सियाह
अन्धकार में डूब
जाता था. थोडा
डरावना भी लगता
था. हम मन
ही मन गाली देके अपने शहर
के घर को
याद करने लगते
थे. झरोखे का
दरवाज़ा खोल गर्मी
दूर करने की
जो कोशिश करते
थे तो गोबर
की खुशबू में
लिपटी हवा हमारे
कमरे को महका
देती थी.
चार पांच दिन
यहाँ गुज़ारने के
बाद जब हम
वापस अपनी मारुती
में सवार होक
जयपुर आते थे
तो यूँ लगता
था की जैसी
एक 'एक्सोटिक हॉलिडे'
मना के आये
हैं. हम अपने
ही देश में
एक टूरिस्ट की
तरह छुटियाँ मना
के आते थे.
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