Friday, April 19, 2013

एक दिन


कल तक रिश्ते टटोल रहे,
सगे और दूर वालों में तोल रहे,
आज एक अनजान के दर्द में,
पल पल रिश्ता जोड़ रहे वो, 

ना मज़हब के बेकार परदे,
ना जात के दर्जे,
आज फर्श पे बैठे हैं,
एक ही जज़्बात थामे दो,

तोप नहीं पर मशाल तो है,
सदन नहीं, सभा नहीं, आवाज़ तो है,
टूटेंगे नहीं आज जिद पे अड़े हैं यों,
रोकोगे एक, जागेंगे सौ,

जो खोज रहे त्रुटी आप में,
औरत के श्रृंगार में, उसके व्यवहार में,
बस इंतज़ार कर रहे वो उस काली रात का
फिर वो भी मिलेंग यहाँ आसूं बहते इस बाज़ार में,

यह कवायद यहाँ ना रुकेगी,
चिंगारी भड़की है और बढ़ेगी,
माना ये अँधेरी राह बहुत बड़ी है,
पर एक दिन सुनहरी सुबह ज़रूर मिलेगी...
~
अविनाश

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