करीम बेकरी की सीढियों पे उसे पहली बार देखा था. पीले सलवार कुर्ते में खुद में सिमटे जा रही थी.
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हडबड़ाता हुआ में दरवाज़ा पीटकर घर में घुसा. कोई 45 मिनट पहले फ़ोन करके मुझे बोली थी की जावेरी बाज़ार होकर आती हूँ. कह रही थी कोई चांदी की पुरानी अंगूठी दी थी...नहीं शायद कोई ताबीज़ था. याद नहीं मुझे. बोली बस दस मिनट में वो लेके आती हूँ.
फिर रेडियो पे सुना कोई धमाका हुआ है. एक बार तो कुछ महसूस ही नहीं हुआ. फिर याद आया की वो भी...
मैंने फटाफट फ़ोन लगाया पर कोई उठा नहीं रहा.
"अरे यास्मीन को देखा क्या?" मैंने महौल्ले में चीख लगा कर पुछा.
मुझे फिर से सन्नाटा ही नसीब हुआ.
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"लड़कियों का पीछा करना बुरी बात होती है. मुझे पसंद नहीं है." उस दिन वो वाकई घुस्से में थी
"तुमसे मिलने का दिल करता है तो में कोशिश करता हूँ..." मैं बेकार कि सफाई दे रहा था.
"हमें वो लड़के पसंद आतें है जो हमारा ख्याल रख सकें, चार पैसे कमा के लाये, एक इज्ज़तदार ज़िन्दगी दे सकें. ना कि मवालीगिरी करते फिरे." उसकी बातों में सच्चाई थी और मेरी आँखों में शर्म.
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"ए ये गाडी किसकी है?" हवालदार ने मेरी 20 साल पुरानी टेक्सी पे अपना डंडा बजाते हुए पूछा.
"साहेब मेरी है. मेरी बीवी कोई सवा घंटा पहले मार्केट..."
"चल हटा इसको" चारो तरफ भागमभाग मची थी, पुलिस के साईरन गूँज रहे थे...शायद ये भी जल्दी में था...मुझे सुनाने का भी वक़्त नहीं था..फिर भी मैं बोला.
"कोई सवा घंटा पहले मेरी बीवी यहीं आई थी...कोई खबर नहीं है. खुदा के लिए मेरी मदद करिए" टूटती आवाज़ मैं मैंने जैसे तैसे कहदिया.
पसीने में लथपथ मेरे जिस्म से जैसे लावा निकल रहा था. घबराहट से दिल ऐसे जोरो से धड़क रहा था कि अब दम टूटेगा...अब दम टूटेगा. बस कोई आके बुरी खबर ना सुना दे. कि कोई मुझे आके कह दे कि ये उस सपने के जैसा है जो बहुत बुरा होता है और सच जैसा लगता है पर आँख खुलते ही महसूस होता है कि अरे वो तो सपना था और एक गहरी सांस के साथ जान में जान लौट आती है.
"क्या नाम है तेरी बीवी का" हवालदार ने नरमी से पुछा
"यास्मीन"
"और तेरा?"
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"जमाल, एक तमाचा पड़ेगा ना तो ये सारी आशिकी भूल जाओगे"
अब्बू को मेरा और यास्मीन का रिश्ता कतई पसंद नहीं था. मुगलसराये में मिनी बस चलाने लगा था और अच्छा कमा भी लेता था. अब्बू चाहते थे कि में किसी बेहतर खानदान में शाद्दी करूँ ताकि और कमा सकूँ. खुद कि बसें हो और लोगों को किराये पे दूँ. पर मेरा सपना उनके सपने से मेल नहीं खाता था. वो शायद मेरा कल देख रहे थे और में अपना आज.
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"आप बैठ जाइये यहाँ थोड़ी देर. लिस्ट बनाने में थोडा वक़्त लगेगा" बड़े साहेब ने हवालात में कोने पे रखी एक स्टूल कि तरफ हाथ दिखाते कहा.
क्या ख़ाक बैठ जाऊं? और कहाँ जाऊं? सोचा एक बार फिर मोबाइल पे कोशिश करता हूँ. घबराके कहीं बैठ गयी होगी. या क्या पता हाथ से मोबाइल छूट गया होगा. मैंने दिल को होंसला दिलाया और फिर से नंबर लगाया. इस बार तो रिंग भी नहीं गयी. मेरी सांस बैठ सी गयी.
टीवी पे देखा और भी दो जगह धमाके हुए हैं. लाशें बिछी पड़ी हैं. रोते बिलखते लोग अपने घरवालों को खोज रहे हैं. बिलकुल मेरी तरह.
"साहेब कुछ पता चला?" मैंने हिम्मत करके पुछा
"देख रहें है चाचा. कोई फोटो है आपके पास?"
फोटो? शादी पे एक निकलवाया था. उस बात को तो 35 साल होगये. मैंने बटुए में से निकाल के दी तो हवालदार चिड के बोला "अरे बाबा ये तो बहुत पुरानी है. क्या उम्र होगी आपकी बीवी कि?"
उम्र...मुझे याद नहीं...
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वो मुझसे बात नहीं कर रही थी. और इस बार कि नाराज़गी कोई पल भर वाली नहीं थी. हमारा झगडा हुआ था और नशे में मैंने तकरीबन उस पर हाथ उठा दिया था.
"क्या तरीका है ये? वापिस छोड़ आओ मुझे घर पे" सुबकते हुए वो मुझे डाट रही थी. "इसलिए बम्बई लाये थे मुझे? कि यार दोस्तों के साथ दारू पीके सड़क पे पड़े रहो और में यहाँ अकेले दम घोटती रहूँ?"
मेरी लापरवाही से बिजली कट गयी थी और घर पे राशन भी नहीं था. कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा मैंने दारू और पत्तों में उड़ा दिया था. यास्मीन ने कई बार पहले समझाया था कि ये यार दोस्त ठीक नहीं मगर मैंने उसकी एक ना सुनी.
मुझे बंबई कि हवा लग गयी थी और वो हमेशा कि तरह ठीक ही बोल रही थी.
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किसी ने आके कहा कि K E M हॉस्पिटल पे बड़े सारे लोग भरती हुए हैं. में गाडी लेके भागा. बदन दम तोड़ रहा था पर उम्मीद ने दिल को संभल रखा था. वैसे भी उससे आजकल ज्यादा चला नहीं जाता था. घुटनों में दर्द रहता था तो बस थोडा चलके बैठ जाती थी. कहाँ वो पूरे जावेरी बाज़ार में चक्कर लगते बैठी होगी. हो सकता है आवाज़ से घबराके...क्या पता...शायद ये लोग बूढी समझ के अस्पताल ले गए होंगे. पगलाया सा में खुद के सवालों का खुद ही ज़वाब दे रहा था. और कोई चारा भी नहीं था.
थोडा ही आगे गया था कि रास्ते पे जाम लगा था. गाड़ी पे गाड़ी. में धीमे धीमे गाडी को जहाँ जगह मिली वहीँ दबाये जा रहा था. मगर कुछ ख़ास आगे नहीं बढ़ा. जाम बहुत लम्बा था. KEM बड़ा दूर दिखाई दे रहा था और अब में खुद को और संभाले नहीं रख सकता था. आँखे नम हो चली और रास्ता धुंधलाने लगा.
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"ये देख अपनी गाडी" मेरी पहली टेक्सी पे मैंने पीछे यास्मीन का नाम लिखवाया था. उसने जाने कैसे पैसे बचा - बचा के एक दिन अचानक मुझे से कहा कि अपनी गाडी लेलेते हैं. मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था.
"अच्छी है" वो मुस्कुराके बोली. "तो आज कहाँ लेके जा रहे हो मुझे?"
"चल तुझे बम्बई घुमा लाऊं"
"नहीं, मुझे हाजी अली दरगाह जाना है. जिसके रहम से ये सब मिल रहा है उसका शुक्रिया तो करें" में उसे बस देखता ही रह गया.
सच बात तो ये थी कि में हर दिन उससे कुछ नया सीखता था. हर दिन ये पाता चलता था कि में कितना गलत हूँ और सिर्फ वोही है जो मुझे हर बार सही रस्ते पे लाती है.
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आँखे पोछ कर मैंने गाडी घुमा ली. अस्पताल जाके कोई फायेदा नहीं था. अगर अब वो मेरी जिंदगी में है तो ढूँढने का क्या फायदा और अगर वो जा चुकी है तो खबर खुद-बा-खुद घर चली आएगी. पत्थर कि तरह मेरी आँखों में कोई हलचल नहीं थी. मैं बम्बई के ट्राफिक को काटता हुआ चल पड़ा. वो आज सुबह ही कह रही थी, आप पैसठ के हो रहे हो. अब थोडा कम चलाया करो. थक जाते हो.
हाजी अली दरगाह मेरे सामने चमचमाती नज़र आरही थी. ये पहली बार था कि में यास्मीन के बिना यहाँ आ रहा था. धीरे धीरे में लहरों के बीच से दरगाह कि तरफ बढ़ता गया. मेरे अन्दर एक दूसरा सैलाब उमड़ रहा था.
वहां बाहर बैठके मैंने दम भरके सांस ली और..फिर फूट फूट के रोया. किसीका क्या बिगाड़ा था. मेरे लिए तो किसी फ़रिश्ते से कम नहीं थी वो. वो नहीं होती तो शायद आज में किसी जेल कि हवा खा रहा होता. अब्बू से भी सुलह उसी ने करायी थी. औरत कि अगर सुनो और उसकी बात कि इज्ज़त करो तो अपना घर ही जन्नत बनती है. मन कर रहा था इस हाथ को काट डालूं. कैसे मैंने एक पल में उसपे ये हाथ उठाया था...मर जाऊंगा उसके बिना...मेरे दिन भी कितने बचे हैं...बेऔलाद तो हम पहले ही थे...जैसे तैसे अपनी गुज़र बसर कर बैठे थे...जब डोक्टोरनी ने हमें बोला कि बच्चा नसीब नहीं है आपको... मैं ठिठक सा गया था. अगर उन दिनों मैं उसका बस थोडा ख्याल रख लेता तो आज औलाद...मेरे दीमाग में तूफ़ान कि तरह ख्याल आ रहे थे और हर ख्याल में सिर्फ यास्मीन थी.
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चुपचाप में अपने कमरे में घुसा और चश्मा उतरके मेज़ पे रख दिया. पिछले चार घंटे में मैंने एक ज़िन्दगी जी ली थी. थक गया था. नींद तो आँखों में थी नहीं. पर अब इंतज़ार भी नहीं था. में पलंग कि अडेस लेके फर्श पे ही बैठ गया. खाना बना पड़ा था पर भूक नहीं थी. दिल बैठता चला जा रहा था. सांस लेने में तकलीफ हो रही थी. अजीब सी घबराहट से जैसे बदन सिमट रहा था. मैंने कमरे पे नज़र घुमाके देखा. हर आले पे, दिवार पे उसकी ही छाप थी. आज घर पे लाइट चालू थी पर रौशनी कि ज़रुरत नहीं थी. में थमने लगा था.
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"ठक ठक ठक" कोई दरवाज़ा पीट रहा था
मैंने घडी देखि तो रात के दो बजे थे..संदेशा आगया था. मेरे दिल में कोई जज़्बात नहीं बचे थे.
"खोलता हूँ" मैंने बत्ती लगायी, चश्मा पहना और दरवाज़ा खोला...देखा तो वो खड़ी थी.
सफ़ेद सलवार कुर्ते में, जो थोडा जला और थोडा काला हुआ पड़ा था. उसकी आँखे भरी हुई थी और वो बेतहाशा थकी हुई.
"यास्मीन!" मेरा उसका नाम लेते ही वो अपना सिर मेरे सीने पे लगाके रो पड़ी. वो जिंदा थी, मेरे करीब थी. वैसे तो ज़िन्दगी के कुछ पल ही बचे थे पर मेरे लिए तो ज़िन्दगी कि एक नयी पहल थी.
~अविनाश पारीक