Friday, May 13, 2016

अवसर

है आरम्भ जग ये जान रहा 
नभ पर कलरव छा रहा 
है मीठी ध्वनि ये तैर रही 
किसी अग्नि तट को भेद रही 
पक्षी रितु नयी जान रहे 
स्वच्छंद गगन पर नाच रहे 
जीवन अँगड़ायी ले रहा 
अवसर नए अब खोल रहा 
मानव तू फिर क्या  सोच रहा 
किस परिचय को तोल रहा 
आकार नहीं कोई बादल का 
ना चेहरा कोई वायु का
देखो निश्चिन्त उड़ रहे 
जल कल कल बह रहा 
स्वर नवीन घोल रहा 
मानव तू फिर क्या सोच रहा 
किस खूटे से अपनी नाव रोक रहा 
समुद्र अपार अवसर है 
तर जा लहरों पर अवसर है 
रंग ढंग जाति योनि सब बंधन है 
बहते की संग बह जाना ही बेहतर अक्सर है 

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