Thursday, March 3, 2016

अचरज

किताबों में पड़ते नहीं अब पत्ते 
जाने बातें छुपा के रखे कहाँ
कुछ याद रखने को नहीं या 
बाँधते नहीं गाठें अब यहाँ 
वक़्त बदला
या हम
क्या पता

ख़त का इंतज़ार होता नहीं अब यहाँ
कभी दिखते नहीं लाल डिब्बे बाज़ार में
कह दिया सब चेहरों मोहरों में या
अब भरोसा नहीं अपनी लिखावट में
वक़्त बदला
या हम
क्या पता

पार्क की बेंच पर मिलते थे चार दीवाने
तर्क होते थे विवाद नहीं
अब गालियाँ देके छुप जाते हो या
डरते हो आँख मिलने से
वक़्त बदला
या हम
क्या पता


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