किताबों में पड़ते नहीं अब पत्ते
जाने बातें छुपा के रखे कहाँ
कुछ याद रखने को नहीं या
बाँधते नहीं गाठें अब यहाँ
वक़्त बदला
या हम
क्या पता
ख़त का इंतज़ार होता नहीं अब यहाँ
कभी दिखते नहीं लाल डिब्बे बाज़ार में
कह दिया सब चेहरों मोहरों में या
अब भरोसा नहीं अपनी लिखावट में
वक़्त बदला
या हम
क्या पता
पार्क की बेंच पर मिलते थे चार दीवाने
तर्क होते थे विवाद नहीं
अब गालियाँ देके छुप जाते हो या
डरते हो आँख मिलने से
वक़्त बदला
या हम
क्या पता
Nice lines
ReplyDeleteNice lines. Keep it up
ReplyDeleteबहुत खूब बहुत उम्दा
ReplyDeleteVery thoughtful and relevant in todaust scenario.
ReplyDeleteबहुत खूब बहुत उम्दा
ReplyDeleteबहुत खूब
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