है अपने चेहरे में सिमट के जा रही ज़िंदगी
लकीरें कुछ तो बता रही कहानी अनकहीं
आँखों में नमी लिए घूम रहे हैं आवारा
चेहरे पे सब बयान और चेहरा छुपा रहे
इस महफ़िल से उस महफ़िल घूम रहे उमीदज़दा
शोर में दिल का सुकून ढूँढता रहे नादान
देखा है ज़िंदगी को करवटें बदलते पल में
नज़र को तरसते थे जिनकी, नज़रें चुरा रहे उनसे
क़सीदे पढ़ते थे अपनी ख़ुदगर्ज़ी की
अब भीक माँग रहे वक़्त से यादों की
क्या क्या समेटोगे यहाँ बिखरा पड़ा बहुत कुछ
आप अपने वादों के रहे ना, ना किसी की यादों के
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