Tuesday, December 8, 2015

सच तो है

है अपने चेहरे में सिमट के जा रही ज़िंदगी 
लकीरें कुछ तो बता रही कहानी अनकहीं

आँखों में नमी लिए घूम रहे हैं आवारा 
चेहरे पे सब बयान और चेहरा छुपा रहे

इस महफ़िल से उस महफ़िल घूम रहे उमीदज़दा 
शोर में दिल का सुकून ढूँढता रहे नादान

देखा है ज़िंदगी को करवटें बदलते पल में 
नज़र को तरसते थे जिनकी, नज़रें चुरा रहे उनसे

क़सीदे पढ़ते थे अपनी ख़ुदगर्ज़ी की 
अब भीक माँग रहे वक़्त से यादों की

क्या क्या समेटोगे यहाँ बिखरा पड़ा बहुत कुछ
आप अपने वादों के रहे ना, ना किसी की यादों के

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