Thursday, April 9, 2015

आँगन


बस दो कमरों का घर और एक संसार भर का आँगन,

कमरों में बातें बिगड़ती तो खुली बाहों से समेट लेता आँगन
काले मटमैले पत्थरों से सबकी ठोकर लेता,
कभी न करता अपने रूप पर आग्रह आँगन
हर सावन को हस के लेता,
हर मौसम में परिवार को सींचता आँगन

नन्हे के क़दमों पे खनकता
किलकारियों में गूँज लगाके
दीवारों को घर कर देता आँगन
साल में साल जोड़ता
घुटनो से साइकिल तक सब कुछ देखता आँगन
नौ महीने का गर्भ माँ का होता तो
जीवन भर का गर्भ होता आँगन

बातों से बातों को यादें करता
माँ जो पालक तोड़ती
या पापड़ बेलती
जाने खुद से क्या क्या कहती
माँ के जाने कितने राज़ जानता आँगन
पर कभी ना किसी से कहता आँगन

सूखी लाल मिर्च की धौस झेलता आँगन
गीली उड़द की रखवाली करता आँगन
जाने कैसे कैसे परिंदे इसकी हथेलियों पे खेलते
पर कभी दानो पे भेद ना करता आँगन

बाबूजी की दोपहर बाटता
बड़ी दीदी की राह देखता
कभी क्रिकेट का मैदान बनता
तो कभी महिला संगीत का मंच बनता आँगन
रूप बदल के हर किरदार में जचता आँगन
गागर में सागर बन जाता आँगन

आते जो त्यौहार
तो गर्व से सीना खोल खुशियां उड़ेल देता आँगन
और जो लगती लगन की लड़ियाँ
तो एक बुज़ुर्ग सा सबको साथ ले के चलता ये आँगन

फिर जब परिंदे उड़ जाते
अपने अपने जीवन में मसरूफ हो जाते
तो सूना पड़ जाता आँगन
रात को जब कमरे सो जाते
तो दूधिया रौशनी में जागता आँगन


2 comments:

  1. Superb. Great. Ejoyed reading....keep writing. Maja aya.

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  2. Touched. One such Angan is always within us, hidden and treasured. Enjoyed reading. Keep it up bro. :)

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