Thursday, April 30, 2015

तु

थक गए पंछी 
उड़ घर को चले 
साँझ निराली 
रात में घुलने लगे 
दिन का वेग 
अब ठहरता बने 
तु भी नीरा
किस द्वेष में जले
प्रीत में खोया पाया
ये रीत पुरानी यूँही चले
कल था कल होगा 
समय कभी न विपरीत चले 

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