हर रात का एक माझी
जीवन डोर को थामे
न सरिका हर रोज़ एक सा
लहरों में लिपटता मन का तिनका
ख्यालों में उलझी ख्वाहिशों की नावें
बड़ी अड़चन, छोटी अड़चन
सब आके ठहरती रात के सिरहाने
कभी मन ही माझी
कभी दर्द बने माझी
कभी उम्मीद डोर को थामे
कभी सवालों में मिलता माझी
भवर बने या जवार बने
तेरा अपना तेरा ना रहे
तो सकुचा सा तू खुद ही माझी
फिर वो पूर्णिमा की रातें
खुशियों से दमकती रातें
मन ही मन मुस्कुराके
साहिलों से टकराती
लहरों से खेलती रातें
उन रातों का भी एक माझी
मस्त अपनी ही चाल में मगन
डोर को मांझा बनाये
हवाओं से खेलता माझी
फिर वो प्रेम की गोते खाती रातें
कभी तू उसका माझी
कभी वो तेरा माझी
आँखों में उतरते सागर
नरम उँगलियों से छूके
रोम रोम से निकलती गागर
कभी अतीत से लड़ती रातें
उन रातों का खामोश माझी
ना तस्वीरों से मिलता
ना तस्वीरों को छोड़ता
पगला सा माझी
एक रात से दूजी रात
रातों से गुजरता ये जीवन
जीवन को पिरोती