Tuesday, September 23, 2014

चित्रकार की आत्मा

में हर सुबह एक नए ख्याल से उठता था. रंग मुझे सोने नहीं देते थे. हर आकृति में मुझे एक मास्टरपीस दिखाई देने लगा था. मेरे अंदर सांस लेता चित्रकार अब हुंकार भरने लगा था. मुझे सपने में तश्तरी पे घुलते रंग नज़र आते थे. लाल के गर्भ से निकल पड़ता हरा और हरे की रागों से कोंधके आगे बढ़ता पीला. कैनवास पे मेरे ब्रश से लपटों की तरह पड़ते रंग. आड़े टेड़े उलटे सीधे मिलते बदलते रंगीले मटमैले रंग. पुराने कलकत्ता की तंग गलियों से सर्र कर निकलती मोटर कारें, ऐसे मेरे कूची के प्रहार. मेरी कल्पना के तार पे धधक के निकलता करंट. अब कैनवास जले तो जले क्यों न. घोड़े और घोड़ों पे सत्रहवीं शताब्दी के लड़ाके. पर चित्र पे घोड़े की व्यथा. इतने रक्त के बीच ये खूबसूरत सा अरबी जानवर. कभी सोचो इसके मंन पे गुजरती होगी. और लहू से सनी मिटटी. सोचो मिटटी की खुशबु कहाँ दम तोड़ती होगी. सोचो? ऐसे भाव सिर्फ एक कलाकार के मंन में आते हैं. रात को तो कइयों ने पोता है. मगर रात में रेडियो पे गुनगुनाता रफ़ी और उसकी धुनों पे नाचती पेंसिल. ये ख्याल मुझे सवेरे तीन बजे आया. सो नहीं पाया. बम्बई का मरीन ड्राइव रात को देखा आपने? नेकलेस डॉक्टर साब नेकलेस. हर बार उसे देखता था और हर बार नया ख्याल. अगर बम्बई में बर्फ पड़ती तो मरीन ड्राइव कैसा जगमगाता? सोचिये अगर पेरिस का आइफल टावर वहां होता तो कैसा दिखता? समझे? भाई दिमाग के डॉक्टर हो दिमाग तो होगा. शायद समझो नहीं तो में चला अपने बिस्तर पे.

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