Thursday, May 1, 2014

ज़िन्दगी की उंगली

काहे को ज़िन्दगी से लड़ते हो, बेकार में जिरह करते हो,
ज़िन्दगी तो खुद एक स्कूल है, उसे सबक सीखने की बात करते हो?

किस बात से ठिठकते हो? क्या गिरने से डरते हो?
या गिरने पर जाने कौन कौन हसेगा, इससे हिचकते हो?

पत्थर रोक सका ना धारा का वेग,
ना ही कारे बादल ढक सके सूरज का तेज़,
क्या ज़िन्दगी को अब भी शीशे में उतारने का दम्भ भरते हो?

थम लो ज़िन्दगी की उंगली और चलते रहो,
करलो भरोसा बचपन जैसा,
बाबूजी की ऊँगली थामे, भीड़ भरे बाजार में चहकते हुए निकलने का,

बनालो खुद को पतंग और बेफिक्र सौंप दो अपनी डोर,
ज़िन्दगी को कराने दो स्वछंद यात्रा तुम्हे गगन का,

कागज़ की नाव बनो, कल कल बहते बारिशों के पानी में,
तैर चलो, भीगते रहो, है ये मल्हार ज़िन्दगी का,

कल की फिक्र करते हो, कल पे पछताते हो,
यूँही फर्श पर आज बिखेरते हो,

थम लो ज़िन्दगी की उंगली और चलते रहो,
करलो भरोसा बचपन जैसा,
कैसे दौड़ पड़ते थे रंग - बिरंगी तितलियों के पीछे,
खिलखिलाते आवारा, खुले आसमां के नीचे...

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