क़दमों में भी उड़ान होती है. अचानक कभी उमंग, हवा बनके पगथलियों के नीचे भर जाती है और चलते कदम हवा में तैरने लगते हैं.
में सत्त्तु से तब मिला जब पुरानी ज़मीन का सौदा करने हम हफ्ते भर के लिए गावं गए थे. घर के पास, एक कमरे के छोटे से घर में एक बूढी औरत और एक छोटा लड़का रहता था.
जाने अनजाने मैंने ये पाया की लड़का पूरा दिन घर के आँगन में बैठा रहता था. अक्सर रेडियो को कान से चिपकाये. बड़ा अजीब था. इस उम्र के सारे दूसरे लड़के तो पूरा दिन खेलते कूदते रहते थे. मुझे लगा शायद बीमार होगा. फिर एक दिन छत पे ऐसे ही रब्बड़ की बॉल से खेलते खेलते मेरी नज़र फिर उसपे पड़ी. किसी बेचारे की तरह मिटटी के फर्श पे लेटा सूरज की गर्मी भांप रहा था. मैंने जान भूजकर बॉल उसके आँगन में फेक दी और उस से मिलने चल पड़ा. उनीस साल की उम्र में जिज्ञासा में बह जाना कोई नयी बात नहीं. ऐसे ही तो हमें नयी बातें पता चलती हैं.
"अरे सुनो, मेरी बॉल यहाँ आ गिरी है. ज़रा देना"
अपनी गोल आँखों से मुझे ऐसे देख रहा था जैसे सालों में पहली बार किसी ने उससे बात की हो. शक्ल पे मिटटी छपी थी. कपडे तो स्कूल यूनिफार्म जैसी कुछ थी. शायद किसी ने दे दी होगी.
"क्या हुआ? वो वहां मेरी बॉल पड़ी है. में जाके ले लूँ?"
उसने मुंडी हिला के हाँ कहा. मैंने जाके बॉल उठा ली. "तुम खेलोगे मेरे साथ?"
वो कमरे के अंदर भाग गया.
अगले दिन मैंने फिर उसे वैसे ही आँगन में बैठे देखा. रेडियो को अलट पलट के बजाने की कोशिश कर रहा था. मैंने पास में लाल मिर्च सुखाती भुआ से पुछा ये कौन लोग हैं. उसने छिटक के कह दिया की लड़का दिमाग से है. हमारी इनसे कोई बातचीत नहीं है. बड़ी अजीब से बात है. गावं में तो कोसो दूर तक जान पहचान रहती है. ये शहरों का फार्मूला यहाँ कैसे!
दो एक दिन और बीत गए. जैसे जैसे मेरे घर जाने के दिन नज़दीक आने लगे वैसे वैसे मेरे मन की बेचैनी बढ़ने लगी. बाजार से लौटते वक़्त मैंने नुक्कड़ के पानवाले से ही पुछ लिया.
"इसके बाप ने तो खुद को एंड करलिया भैया. कर्जा वर्जा बहुत हो गया था सर पे. दारु अलग. पूरा दिन रेडियो पे विविधभारती लगाके घूमता रहता था. निकम्मा एक नंबर का. मेरा भी पैसा दिया नहीं."
"और वो लड़का?"
"भैया वो ऐसे ही है. दिमाग से है. बाप की तरह ही पड़ा रहता है"
मैंने उसके घर की तरफ रुख करलिया. में कोई गुत्थी सुलझाना नहीं चाहता था. बस मुझे उसे जानना था.
"इधर आओ" मैंने उसे बुलाया "बाजार चलोगे?"
उसने मना कर दिया. मुझे अचरज नहीं हुआ.
"चलो तुम्हे घुमा के लाऊँ. क्या दिन भर घर में बैठे रहते हो"
"नहीं जाना" उसने धीमे से कहा
"क्यों" मैंने हलके ग़ुस्से से पुछा
"मुझे डर लगता है" सर झुका के बोला
"डरना किस बात का? चल मेरे साथ" उसका पतला सा हाथ पकड़ के में चल पड़ा.
रास्ते पे चलते हुए मैंने उससे पूछा "तू खेलता क्यों नहीं है? तेरे जैसे बाकी सारे लड़के तो पूरे दिन आवारागर्दी करते हैं"
"वो मार पीट करते हैं" पहली बार कुछ खुलके बोला उसने "मुझे डर लगता है उनसे"
"और स्कूल वगहरा भी इसलिए ही नहीं जाता होगा?" मैंने थोड़ा और कुरेदा
"माँ के पास पैसे नहीं हैं स्कूल के. जब बापू था तब तक जाता था" एक किस्सा और खत्म कर दिया इसने
एक मायूस से बच्चे को हसीं दिलाने बाजार निकला था में. मुझे ये भी पता नहीं था की मेरे पास उतने पैसे हैं भी या नहीं.
"चल आज से में तेरा दोस्त. हम खेलेंगे"
वो मुस्कुरा दिया और बोला "पर आप तो मुझसे बड़े हो"
में भी हंस पड़ा.
"रेवड़ी खायेगा?" मैंने पुछा
"रेवड़ी? वो क्या होती है?"
"रेवड़ी नहीं पता तुझे?" में नीरा बेवकूफ ये क्या पूछ बैठा
उसने मूह हिला के मना कर दिया
"अरे रेवड़ी बड़ी मस्त होती है. मीठी मीठी." वो लालयत होक सुनाने लगा "तिल के दानों को गुड में गूंथ छोटी छोटी चपटी गोली जैसे बनाते हैं. उसमें इलायची भी होती है"
गोल गोल आँखों से मेरी बातें सुन रहा था. क़दमों में चपलता आ रही थी. रेवड़ी जितनी छोटी उतना ही बड़ा काम कर रही थी. एक जंग लगी मोटर में ऊर्जा आरही थी.
"भैया क्या वो गरम गरम होती है?" भोले मन से उसने पुछा
"नहीं रे. सुखी होती है. बहुत टेस्टी होती है"
टेस्टी उसके सर के ऊपर से निकल गया. मगर कोतूहल चेहरे पे लगी मिटटी को झाड़ता हुआ बहार निकल रहा था.
हम रेवड़ी के ठेले पे पहुंचे तो ठेलेवाले ने हेय दृष्टि से उसे देखा. मैंने दस रुपैये की दो रेवड़ी की पुड़िया बँधवाली. एक उसे दी और दूसरी लेके हम बगीचे की मुंढेर पे बैठ गए
वो बिना रुके चपड़ चपड़ आवाज़ करके खाने लगा. मैंने बीच में एक आध बार पुछा कैसी लगी तो हाथ पैर मुह हिला के कह दिया अच्छी है. मैंने उसकी मासूमियत के आवेग में आके बड़े वात्सल्य के साथ उसके बालों में हाथ फेर दिया. हाथ फेरते ही कोयले सी रेत बालों से उड़ चली. मैंने अपनी कमीज से ही अपने हाथ पोंछ लिए. अँधेरा होने को था तो हम घर लौट चले.
रस्ते में मैंने उससे कहा की कल फिर आऊंगा, खेलने चलेंगे. वो मुस्कुरा दिया. आज पूरी रात वो तारे गिनने वाला था.
अगले दिन सवेरे ही में उसके आँगन में पहुँच गया. वो दोनों पैर फैलाये रेडियो लेके बैठा था. मुझे देख उठ खड़ा हुआ और मुस्कुराने लगा.
"चलें?" मैंने पुछा. उसने अपनी माँ की तरफ देखा. सूती साडी में लिपटी एक बूढी से औरत पे मेरी नज़र गयी. मुझे लगा ये अभी डंडा उठा के मुझे मारेगी. "ज़्यादा दूर लेके मत जाना. छोरे मारते हैं इससे"
ये हिदायत देते हुए उसने हमें जाने को कहा
"तुझे पढ़ने लिखने का मन तो करता होगा?" ये बात तो पक्की थी की मेरी जिज्ञासा की कोई आत्मा नहीं थी. वो वो सारे सवाल पूछ रही थी जिससे इस लड़के को ठेस पहुंचे
"पहले में स्कूल जाता था" वो चलते चलते बोला "मगर अब बंद हो गया." आवाज़ मंद होने लगी थी "मेरे दोस्त भी थे स्कूल में. वो अब भी जाते हैं" रूआंसा गाला और बैठती आवाज़
"अरे रोता क्यों है...अ अ ..तेरा नाम क्या है रे?" सब कुछ पुछा मैंने पर नाम तो जाना ही नहीं
"सत्त्तु" वो बोला
"सत्त्तु नाम है तेरा? स्कूल में भी यही बोलते थे?"
"नहीं स्कूल का नाम तो सतीश है" "सतीश कुमार"
"बड़ा अच्छा नाम है. यही नाम बताया कर सबको" छोटे भाई की तरह हाँ में हाँ मिलाके वो मुस्कुरादिया
"में अपना स्कूल दिखाऊं आपके?" एक पंछी की प्रकृति है उड़ना. चाहे पंख चोटिल हों मगर उनमें उड़ने की तृष्णा कभी कम नहीं होती. वो तब तक फड़फड़ाते रहते हैं जब तक उड़ न लें.
"चलो चलो में भी देखूं मास्टर सतीश कुमार का स्कूल" मेरी ये बात सुन वो खिलखिला उठा
एक पीली सी पुरानी दीवारों पे खड़ी बिल्डिंग उसकी स्कूल थी. सफ़ेद शर्ट और नीले निक्कर पहने लड़के और नीली सलवार कमीज सफ़ेद दुपट्टे पहनी लड़कियां वहां पढ़ रहे थे, खेल रहे थे. सतीश पानी की टंकी के पीछे से छुप के उन्हें देख रहा था. मैंने उससे कहा की अपने दोस्तों से मिलवा तो वो उल्टा भाग गया. में स्कूल की तरफ चल दिया.
दस पंद्रह मिनट बाद जब में वापस आया तो देखा तो मोड़ पे बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा था. "तू भाग क्यों गया?"
"आप स्कूल के अंदर जाके आये?" सतीश ने पुछा. मैंने हाँ बोलके सर हिला दिया
"मेरी क्लास में भी गए थे? तीन नंबर कमरे में" सचमुच बड़ा लगाव था स्कूल से उसे. मैंने कहा हाँ. वो खुश हो गया
"आगे से दूसरी बेंच पे में बैठता था" "मेरा नाम भी गुदा है उसपे" हंस के बोला
हम घर चल दिए
मेरे शेहेर जाने के दिन वापस आ रहे थे. कॉलेज शुरू होने वाले थे और यहाँ का काम भी पूरा हो गया था. में यहाँ वापस भी आने वाला नहीं था. पर ये सूगले से सतीश को फिर से ज़मीन पे लोटने को छोड़ना मुझे खेल सा रहा था. मेरा कोई खून का रिश्ता तो था नहीं मगर फिर भी उसमें सतीश के लिए वेग था. मेरा मन तो ये कर रहा था की उसे फिर से स्कूल में डाल दूँ. बेचारा बच्चा अपने स्कूल के बेहद याद करता है. पढ़ लेगा तो कुछ करेगा नहीं तो दो तीन साल में चरसी बनके किसी लॉक उप में मिलेगा. पर स्कूल में डालने जितने पैसे मेरे पास तो नहीं थे. ना मेरे घरवाले मुझे देते. उस रात में सवालों की चटाई बिछाके सो गया. पूरी रात काँपता रहा मगर चादर क्या रुमाल भी नहीं मिला.
अलगी सुबह गावं में मेरी आखरी सुबह थी. घर में सरगर्मी थी. सामान समेटो, ये लो, वो रखो. में नह धोके अपना बैग जमाके उसके घर गया. वो मुंडेर पे बैठा मेरी बॉल से खेल रहा था. मुझे देखके बॉल देने नज़दीक आगया. मैंने कहा की ये रखले. फिर में उसके साथ उसही मुंडेर पे बैठ गया. पास में उसका रेडियो पड़ा था. "तू हमेशा ये रेडियो क्यों अलटता पलटता रहता है? बजता तो है नहीं" मैंने रेडियो हाथ में लेके पुछा
"बापू इसको बजते थे. उनका है ये. पर अब बजता नहीं. आप बज सकते हो?" उसने रेडियो को खनकते हुए बोला
"देखता हूँ. इसके पेंच खोलने पड़ेंगे. जा एक चाकू लेके आ" मेरे कहने पे वो अंदर चाकू लेने चला गया. अंदर से आवाज़ आई माँ से चाकू मांगने की
मैंने जेब से एक चाबी निकाल के रेडियो को बीच में से खोलने की कोशिश की. रेडियो ठक से खुला और अंदर से पांच-सो और सो के नोट नीचे गिर पड़े. मेरी आखें फटी की फटी रहगयी
रेडियो में सतीश के बापू ने पैसे ठूस रखे थे. मैंने घबराके सारे अपने जेब में डाल लिए. इतने में सतीश बहार आया और रेडियो को खुला देख के उछलने लगा. जैसे रेडियो नहीं उसकी किस्मत खुल गयी.
हाँ शायद किस्मत ही खुल गयी.
मैंने घर के पीछे जाके पैसे गिने. कुछ ३२०० रुपये थे. मैंने उसी वक़्त स्कूल में जाके २००० रुपये पूरे साल के जमा करा दिए. फिर बाजार जाके ८०० रुपये के दो जोड़ी स्कूल यूनिफार्म खरीद लिए. बचे पैसों से में किताबें और पेंसिल वगहरा खरीदलिये. शाम को ये सब लेके में उसके घर आया. माताजी बहार चूल्हा सुलगा रही थी. में उनके पास आया और बोला अपनी तरफ से सतीश का एडमिशन फिर से स्कूल में करा दिया है. आपसे पैसे नहीं मांगेंगे. एक बार तो वो कुछ नहीं बोली. फिर सतीश की तरह मुड़कर देखा और उससे पूछा "स्कूल भेज रहे तेरेको. जाएगा?" सतीश मेरे करीब आया और मेरी बांह पकड़ के बोला "हाँ जाऊँगा ना. भैया किताब भी लाया है" माताजी के सपाट चेहरे पे एक अदनी सी मुस्कराहट निखर आई थी.
अगली सुबह छः बजे में उसके घर पहुँच गया. स्कूल का पहले दिन जो था. मिटटी में सने सत्त्तु को सतीश बनाना था. मैंने भाईसाब को रगड़ रगड़ के नहलाया. एक शैम्पू का पाउच उसके सर पे उड़ेला और रगड़ा तो काले रंग का गाढ़ा मेला पानी उसके गालों से होता उसके पेट तक जा पहुंचा. नेहला धुल के नयी यूनिफार्म पहनाई. बालों में हल्का तेल लगाके ठीक से बनाये. जूते पहनाये. नए स्कूल बैग में किताबें भरी और पेंसिल को शार्पनर से तीखे नोक निकल के बॉक्स में रख दी. सेनापति कूच करने को तैयार था. स्टेडियम में शोर था. बड़े बड़े पोस्टर लग चुके थे. आज एक नया दिन था. जिसे में रोज़ाना फर्श पे लिपटते देखा था वो आज कहीं नहीं दिख रहा था. रेडियो भी गायब था. उसके पिता कहीं से तो ये सब देख रहे होंगे और शायद खुद पे गर्व भी कर रहें होंगे. आखिर उनकी संपत्ति उनके बेटे के ही काम आयी. माताजी अपने साफ़ सुथरे सत्त्तु को देखके फूले नहीं समां रही थी. और यहाँ सतीश कुमार स्कूल को निकल पड़े थे. ख़ुशी से गगन चूमते, फलांगे भरते, उत्साह की सवारी करते कमरा नंबर तीन की तरफ वो बढ़ चुके थे. उनके क़दमों में उड़ान थी.
मेरी भी गाडी तैयार थी.
में सत्त्तु से तब मिला जब पुरानी ज़मीन का सौदा करने हम हफ्ते भर के लिए गावं गए थे. घर के पास, एक कमरे के छोटे से घर में एक बूढी औरत और एक छोटा लड़का रहता था.
जाने अनजाने मैंने ये पाया की लड़का पूरा दिन घर के आँगन में बैठा रहता था. अक्सर रेडियो को कान से चिपकाये. बड़ा अजीब था. इस उम्र के सारे दूसरे लड़के तो पूरा दिन खेलते कूदते रहते थे. मुझे लगा शायद बीमार होगा. फिर एक दिन छत पे ऐसे ही रब्बड़ की बॉल से खेलते खेलते मेरी नज़र फिर उसपे पड़ी. किसी बेचारे की तरह मिटटी के फर्श पे लेटा सूरज की गर्मी भांप रहा था. मैंने जान भूजकर बॉल उसके आँगन में फेक दी और उस से मिलने चल पड़ा. उनीस साल की उम्र में जिज्ञासा में बह जाना कोई नयी बात नहीं. ऐसे ही तो हमें नयी बातें पता चलती हैं.
"अरे सुनो, मेरी बॉल यहाँ आ गिरी है. ज़रा देना"
अपनी गोल आँखों से मुझे ऐसे देख रहा था जैसे सालों में पहली बार किसी ने उससे बात की हो. शक्ल पे मिटटी छपी थी. कपडे तो स्कूल यूनिफार्म जैसी कुछ थी. शायद किसी ने दे दी होगी.
"क्या हुआ? वो वहां मेरी बॉल पड़ी है. में जाके ले लूँ?"
उसने मुंडी हिला के हाँ कहा. मैंने जाके बॉल उठा ली. "तुम खेलोगे मेरे साथ?"
वो कमरे के अंदर भाग गया.
अगले दिन मैंने फिर उसे वैसे ही आँगन में बैठे देखा. रेडियो को अलट पलट के बजाने की कोशिश कर रहा था. मैंने पास में लाल मिर्च सुखाती भुआ से पुछा ये कौन लोग हैं. उसने छिटक के कह दिया की लड़का दिमाग से है. हमारी इनसे कोई बातचीत नहीं है. बड़ी अजीब से बात है. गावं में तो कोसो दूर तक जान पहचान रहती है. ये शहरों का फार्मूला यहाँ कैसे!
दो एक दिन और बीत गए. जैसे जैसे मेरे घर जाने के दिन नज़दीक आने लगे वैसे वैसे मेरे मन की बेचैनी बढ़ने लगी. बाजार से लौटते वक़्त मैंने नुक्कड़ के पानवाले से ही पुछ लिया.
"इसके बाप ने तो खुद को एंड करलिया भैया. कर्जा वर्जा बहुत हो गया था सर पे. दारु अलग. पूरा दिन रेडियो पे विविधभारती लगाके घूमता रहता था. निकम्मा एक नंबर का. मेरा भी पैसा दिया नहीं."
"और वो लड़का?"
"भैया वो ऐसे ही है. दिमाग से है. बाप की तरह ही पड़ा रहता है"
मैंने उसके घर की तरफ रुख करलिया. में कोई गुत्थी सुलझाना नहीं चाहता था. बस मुझे उसे जानना था.
"इधर आओ" मैंने उसे बुलाया "बाजार चलोगे?"
उसने मना कर दिया. मुझे अचरज नहीं हुआ.
"चलो तुम्हे घुमा के लाऊँ. क्या दिन भर घर में बैठे रहते हो"
"नहीं जाना" उसने धीमे से कहा
"क्यों" मैंने हलके ग़ुस्से से पुछा
"मुझे डर लगता है" सर झुका के बोला
"डरना किस बात का? चल मेरे साथ" उसका पतला सा हाथ पकड़ के में चल पड़ा.
रास्ते पे चलते हुए मैंने उससे पूछा "तू खेलता क्यों नहीं है? तेरे जैसे बाकी सारे लड़के तो पूरे दिन आवारागर्दी करते हैं"
"वो मार पीट करते हैं" पहली बार कुछ खुलके बोला उसने "मुझे डर लगता है उनसे"
"और स्कूल वगहरा भी इसलिए ही नहीं जाता होगा?" मैंने थोड़ा और कुरेदा
"माँ के पास पैसे नहीं हैं स्कूल के. जब बापू था तब तक जाता था" एक किस्सा और खत्म कर दिया इसने
एक मायूस से बच्चे को हसीं दिलाने बाजार निकला था में. मुझे ये भी पता नहीं था की मेरे पास उतने पैसे हैं भी या नहीं.
"चल आज से में तेरा दोस्त. हम खेलेंगे"
वो मुस्कुरा दिया और बोला "पर आप तो मुझसे बड़े हो"
में भी हंस पड़ा.
"रेवड़ी खायेगा?" मैंने पुछा
"रेवड़ी? वो क्या होती है?"
"रेवड़ी नहीं पता तुझे?" में नीरा बेवकूफ ये क्या पूछ बैठा
उसने मूह हिला के मना कर दिया
"अरे रेवड़ी बड़ी मस्त होती है. मीठी मीठी." वो लालयत होक सुनाने लगा "तिल के दानों को गुड में गूंथ छोटी छोटी चपटी गोली जैसे बनाते हैं. उसमें इलायची भी होती है"
गोल गोल आँखों से मेरी बातें सुन रहा था. क़दमों में चपलता आ रही थी. रेवड़ी जितनी छोटी उतना ही बड़ा काम कर रही थी. एक जंग लगी मोटर में ऊर्जा आरही थी.
"भैया क्या वो गरम गरम होती है?" भोले मन से उसने पुछा
"नहीं रे. सुखी होती है. बहुत टेस्टी होती है"
टेस्टी उसके सर के ऊपर से निकल गया. मगर कोतूहल चेहरे पे लगी मिटटी को झाड़ता हुआ बहार निकल रहा था.
हम रेवड़ी के ठेले पे पहुंचे तो ठेलेवाले ने हेय दृष्टि से उसे देखा. मैंने दस रुपैये की दो रेवड़ी की पुड़िया बँधवाली. एक उसे दी और दूसरी लेके हम बगीचे की मुंढेर पे बैठ गए
वो बिना रुके चपड़ चपड़ आवाज़ करके खाने लगा. मैंने बीच में एक आध बार पुछा कैसी लगी तो हाथ पैर मुह हिला के कह दिया अच्छी है. मैंने उसकी मासूमियत के आवेग में आके बड़े वात्सल्य के साथ उसके बालों में हाथ फेर दिया. हाथ फेरते ही कोयले सी रेत बालों से उड़ चली. मैंने अपनी कमीज से ही अपने हाथ पोंछ लिए. अँधेरा होने को था तो हम घर लौट चले.
रस्ते में मैंने उससे कहा की कल फिर आऊंगा, खेलने चलेंगे. वो मुस्कुरा दिया. आज पूरी रात वो तारे गिनने वाला था.
अगले दिन सवेरे ही में उसके आँगन में पहुँच गया. वो दोनों पैर फैलाये रेडियो लेके बैठा था. मुझे देख उठ खड़ा हुआ और मुस्कुराने लगा.
"चलें?" मैंने पुछा. उसने अपनी माँ की तरफ देखा. सूती साडी में लिपटी एक बूढी से औरत पे मेरी नज़र गयी. मुझे लगा ये अभी डंडा उठा के मुझे मारेगी. "ज़्यादा दूर लेके मत जाना. छोरे मारते हैं इससे"
ये हिदायत देते हुए उसने हमें जाने को कहा
"तुझे पढ़ने लिखने का मन तो करता होगा?" ये बात तो पक्की थी की मेरी जिज्ञासा की कोई आत्मा नहीं थी. वो वो सारे सवाल पूछ रही थी जिससे इस लड़के को ठेस पहुंचे
"पहले में स्कूल जाता था" वो चलते चलते बोला "मगर अब बंद हो गया." आवाज़ मंद होने लगी थी "मेरे दोस्त भी थे स्कूल में. वो अब भी जाते हैं" रूआंसा गाला और बैठती आवाज़
"अरे रोता क्यों है...अ अ ..तेरा नाम क्या है रे?" सब कुछ पुछा मैंने पर नाम तो जाना ही नहीं
"सत्त्तु" वो बोला
"सत्त्तु नाम है तेरा? स्कूल में भी यही बोलते थे?"
"नहीं स्कूल का नाम तो सतीश है" "सतीश कुमार"
"बड़ा अच्छा नाम है. यही नाम बताया कर सबको" छोटे भाई की तरह हाँ में हाँ मिलाके वो मुस्कुरादिया
"में अपना स्कूल दिखाऊं आपके?" एक पंछी की प्रकृति है उड़ना. चाहे पंख चोटिल हों मगर उनमें उड़ने की तृष्णा कभी कम नहीं होती. वो तब तक फड़फड़ाते रहते हैं जब तक उड़ न लें.
"चलो चलो में भी देखूं मास्टर सतीश कुमार का स्कूल" मेरी ये बात सुन वो खिलखिला उठा
एक पीली सी पुरानी दीवारों पे खड़ी बिल्डिंग उसकी स्कूल थी. सफ़ेद शर्ट और नीले निक्कर पहने लड़के और नीली सलवार कमीज सफ़ेद दुपट्टे पहनी लड़कियां वहां पढ़ रहे थे, खेल रहे थे. सतीश पानी की टंकी के पीछे से छुप के उन्हें देख रहा था. मैंने उससे कहा की अपने दोस्तों से मिलवा तो वो उल्टा भाग गया. में स्कूल की तरफ चल दिया.
दस पंद्रह मिनट बाद जब में वापस आया तो देखा तो मोड़ पे बैठा मेरा इंतज़ार कर रहा था. "तू भाग क्यों गया?"
"आप स्कूल के अंदर जाके आये?" सतीश ने पुछा. मैंने हाँ बोलके सर हिला दिया
"मेरी क्लास में भी गए थे? तीन नंबर कमरे में" सचमुच बड़ा लगाव था स्कूल से उसे. मैंने कहा हाँ. वो खुश हो गया
"आगे से दूसरी बेंच पे में बैठता था" "मेरा नाम भी गुदा है उसपे" हंस के बोला
हम घर चल दिए
मेरे शेहेर जाने के दिन वापस आ रहे थे. कॉलेज शुरू होने वाले थे और यहाँ का काम भी पूरा हो गया था. में यहाँ वापस भी आने वाला नहीं था. पर ये सूगले से सतीश को फिर से ज़मीन पे लोटने को छोड़ना मुझे खेल सा रहा था. मेरा कोई खून का रिश्ता तो था नहीं मगर फिर भी उसमें सतीश के लिए वेग था. मेरा मन तो ये कर रहा था की उसे फिर से स्कूल में डाल दूँ. बेचारा बच्चा अपने स्कूल के बेहद याद करता है. पढ़ लेगा तो कुछ करेगा नहीं तो दो तीन साल में चरसी बनके किसी लॉक उप में मिलेगा. पर स्कूल में डालने जितने पैसे मेरे पास तो नहीं थे. ना मेरे घरवाले मुझे देते. उस रात में सवालों की चटाई बिछाके सो गया. पूरी रात काँपता रहा मगर चादर क्या रुमाल भी नहीं मिला.
अलगी सुबह गावं में मेरी आखरी सुबह थी. घर में सरगर्मी थी. सामान समेटो, ये लो, वो रखो. में नह धोके अपना बैग जमाके उसके घर गया. वो मुंडेर पे बैठा मेरी बॉल से खेल रहा था. मुझे देखके बॉल देने नज़दीक आगया. मैंने कहा की ये रखले. फिर में उसके साथ उसही मुंडेर पे बैठ गया. पास में उसका रेडियो पड़ा था. "तू हमेशा ये रेडियो क्यों अलटता पलटता रहता है? बजता तो है नहीं" मैंने रेडियो हाथ में लेके पुछा
"बापू इसको बजते थे. उनका है ये. पर अब बजता नहीं. आप बज सकते हो?" उसने रेडियो को खनकते हुए बोला
"देखता हूँ. इसके पेंच खोलने पड़ेंगे. जा एक चाकू लेके आ" मेरे कहने पे वो अंदर चाकू लेने चला गया. अंदर से आवाज़ आई माँ से चाकू मांगने की
मैंने जेब से एक चाबी निकाल के रेडियो को बीच में से खोलने की कोशिश की. रेडियो ठक से खुला और अंदर से पांच-सो और सो के नोट नीचे गिर पड़े. मेरी आखें फटी की फटी रहगयी
रेडियो में सतीश के बापू ने पैसे ठूस रखे थे. मैंने घबराके सारे अपने जेब में डाल लिए. इतने में सतीश बहार आया और रेडियो को खुला देख के उछलने लगा. जैसे रेडियो नहीं उसकी किस्मत खुल गयी.
हाँ शायद किस्मत ही खुल गयी.
मैंने घर के पीछे जाके पैसे गिने. कुछ ३२०० रुपये थे. मैंने उसी वक़्त स्कूल में जाके २००० रुपये पूरे साल के जमा करा दिए. फिर बाजार जाके ८०० रुपये के दो जोड़ी स्कूल यूनिफार्म खरीद लिए. बचे पैसों से में किताबें और पेंसिल वगहरा खरीदलिये. शाम को ये सब लेके में उसके घर आया. माताजी बहार चूल्हा सुलगा रही थी. में उनके पास आया और बोला अपनी तरफ से सतीश का एडमिशन फिर से स्कूल में करा दिया है. आपसे पैसे नहीं मांगेंगे. एक बार तो वो कुछ नहीं बोली. फिर सतीश की तरह मुड़कर देखा और उससे पूछा "स्कूल भेज रहे तेरेको. जाएगा?" सतीश मेरे करीब आया और मेरी बांह पकड़ के बोला "हाँ जाऊँगा ना. भैया किताब भी लाया है" माताजी के सपाट चेहरे पे एक अदनी सी मुस्कराहट निखर आई थी.
अगली सुबह छः बजे में उसके घर पहुँच गया. स्कूल का पहले दिन जो था. मिटटी में सने सत्त्तु को सतीश बनाना था. मैंने भाईसाब को रगड़ रगड़ के नहलाया. एक शैम्पू का पाउच उसके सर पे उड़ेला और रगड़ा तो काले रंग का गाढ़ा मेला पानी उसके गालों से होता उसके पेट तक जा पहुंचा. नेहला धुल के नयी यूनिफार्म पहनाई. बालों में हल्का तेल लगाके ठीक से बनाये. जूते पहनाये. नए स्कूल बैग में किताबें भरी और पेंसिल को शार्पनर से तीखे नोक निकल के बॉक्स में रख दी. सेनापति कूच करने को तैयार था. स्टेडियम में शोर था. बड़े बड़े पोस्टर लग चुके थे. आज एक नया दिन था. जिसे में रोज़ाना फर्श पे लिपटते देखा था वो आज कहीं नहीं दिख रहा था. रेडियो भी गायब था. उसके पिता कहीं से तो ये सब देख रहे होंगे और शायद खुद पे गर्व भी कर रहें होंगे. आखिर उनकी संपत्ति उनके बेटे के ही काम आयी. माताजी अपने साफ़ सुथरे सत्त्तु को देखके फूले नहीं समां रही थी. और यहाँ सतीश कुमार स्कूल को निकल पड़े थे. ख़ुशी से गगन चूमते, फलांगे भरते, उत्साह की सवारी करते कमरा नंबर तीन की तरफ वो बढ़ चुके थे. उनके क़दमों में उड़ान थी.
मेरी भी गाडी तैयार थी.