है आरम्भ जग ये जान रहा
नभ पर कलरव छा रहा
है मीठी ध्वनि ये तैर रही
किसी अग्नि तट को भेद रही
पक्षी रितु नयी जान रहे
स्वच्छंद गगन पर नाच रहे
जीवन अँगड़ायी ले रहा
अवसर नए अब खोल रहा
मानव तू फिर क्या सोच रहा
किस परिचय को तोल रहा
आकार नहीं कोई बादल का
ना चेहरा कोई वायु का
देखो निश्चिन्त उड़ रहे
जल कल कल बह रहा
स्वर नवीन घोल रहा
मानव तू फिर क्या सोच रहा
किस खूटे से अपनी नाव रोक रहा
समुद्र अपार अवसर है
तर जा लहरों पर अवसर है
रंग ढंग जाति योनि सब बंधन है
बहते की संग बह जाना ही बेहतर अक्सर है