Saturday, February 23, 2013

बचपन

चल माटी के सत्तू फिर बनायें, 
माचिस की डिब्बियों से ट्रेन बनायें,
साइकिल की रेस लगायें, 
कूद फांद के पतंग लूट के लायें,
अम्मा डाटें तो खिलखिलाएं, 
टूटे दाँतों के किस्से सुनाएँ,
किताब खुले तो ऊंघ लगायें,
छुप छुप के बर्फी खाएं...

"बस में और तू"



"माँ देखो चिंगारी" अपनी नन्ही सी उँगलियों को आसमान की तरफ दिखाते हुए आदित्य ने बोला

"उसे आतिशबाजी बोलते हैं" मैंने आहिस्ते से उसे कम्बल में सिमटते हुए कहा "वो देखो ..वहां..वो लोग नीचे से आसमान में ये पटाखा छोड़ते हैं. फिर वो ऊपर जाके ऐसे रंग बिरंगी आतिशबाजी बन जाती है"

"हम भी ऐसे पटाखा छोड़ सकते हैं माँ?"

"हाँ! बिलकुल. कल रात को पक्का"

मेरे वादा करते ही उसकी आखों में चमक आ गयी. "बहुत मज़ा आएगा ना! हम बहुत सारी आतिशबाजी करेंगे ...."

उसकी बातें अब कहाँ ठेहेरने वाली थी. जब तक सोयेगा नहीं ऐसे ही कहानियां बनाता रहेगा.
"माँ ये पटाखों में रंग कैसे डालते हैं?" कभी ग्रीन  कभी रेड ...हर बार नया रंग निकलता है."

और ढेर सारे सवाल. हर रोज़ ऐसे हजारों सवालों के जवाब देता हूँ. 'हम पानी से क्यों नहाते हैं? ब्रूनो हमारी तरह बोलता क्यों नहीं? मिश्रा अंकल के सारे बाल सफ़ेद क्यों हैं? आपको मूछें क्यों है?'

बाकि सवालों के जवाब तो फिर भी दे दूंगा मगर एक दिन पूछेगा कि में आपको माँ क्यों बोलता हूँ. पापा क्यों नहीं बोलता. मुझे नहीं पता उस दिन में क्या जवाब दूंगा. अदिति के जाने के बाद मैंने आदित्य के लिए वो सब कुछ किया जो वो करती. उसके कपडे इस्त्री करना, उसकी पसंद का टिफिन बनाके  देना, स्कूल छोड़ के आना, उसके ख्यालों कि दुनिया में खेलना, उसकी सुपर हीरो वाली कहानिया सुनना. रात को उसे सीने से लगाके सुलाना, आधी रात को उठ कर देखना कहीं उसने कपडे तो गीले नहीं कर दिए... और फिर इन सब में उसका अचानक मुझे माँ कह देना. तब क्या कहता? मेरे पास दो ही रास्ते थे, या तो में उसे टोक देता और कहता कि मुझे माँ नहीं पापा बोलो और फिर जुन्झता रहता कि जाने इस मासूम उम्र में कैसे उसे समझाऊं कि अब वो माँ किसी को नहीं बुलाएगा… या फिर में माँ ही बन के रहता. अपनी नौ से छे के जॉब छोड़ के पूरा दिन उसका ख्याल रखता, उसे बढ़ता देखता और एक नए सिरे से ज़िन्दगी शुरू करता. मैंने दूसरा रास्ता अपनाया. में माँ बन गया और अब मुझे माँ नाम से खुद को बुलवाना पसंद है. मेरे लिए माँ होना, माँ के जैसा दिखना नहीं है बल्कि माँ के तरह होना है.

"माँ "

"हाँ, आदि"

"में आयरन मेंन कि तरह उड़ के स्कूल क्यों नहीं जा सकता ?"

....