Friday, April 25, 2014

नज़ारे

बड़े  बदनसीब  हैं  ये  नज़ारे  जो  तुम्हे  देख  नहीं  पाते,

कैसी  होती  है  पहाड़ों  से  झूमती  रौशनी ,
पानी  की  चादरों  पे  बिखरती  ज़िन्दगी,

मेरी  आँखों  में  सिमट  के  करवट  लेती  ख़ुशी ,
मस्त  हवाओं  में  खेलती  ज़िन्दगी,

क्या  समंदर,  क्या  लहलहाते बागान,
बारीक पगडंडियों से मिलता आसमान,

बड़े  बदनसीब  हैं  ये  नज़ारे  जो  तुम्हे  देख  नहीं  पाते,
जाने  किस  ऐठ  में  आँखें  दिखाते,

बेपरवाह हसने  पे  मौसम  बदल  जाते,
पलकों  के  ढलते  दिन  बदल  जाते,

देखा  है  हमने  ज़मीं  पे  सितारे,
बड़े  बदनसीब  हैं  ये  नज़ारे  जो  तुम्हे  देख  नहीं  पाते ... 

Friday, April 4, 2014

उलझन

किताबों में किरदार मिलते है , 
किरदारों में उलझन , 
उनकी उलझनों में उलझ जाता हूँ मैं , 
किताबों में सिमटके सियाही हो जाता हूँ मैं ...