ये छोटे शहर की महक भी
लाजवाब होती है. तंग गलियों से गुजरते हुए
बरामदे निकलते हैं. उन्ही बरामदों से लगी सालों पुरानी हवेलियाँ मिलती हैं.
कौशल्या मौसी भी इन्ही में से किसी एक हवेली में पिछले अस्सी सालों से रोजाना
तुलसी के पौधे को पानी दे रही हैं. मौसम बदलते गये और
कितनी बार तुलसी का पौधा सूख गया या जल गया... लेकिन कौशल्या मौसी नही बदली. मजे की बात ये है भी हैं कि कौशल्या मौसी दादी, चाची, नानी और ना जाने क्या क्या बन गयी, मगर बुलाते सब उन्हें कौशल्या मौसी ही हैं. ये
छोटे शहर वाले बड़े ढीट होते
हैं; बदलते ही नही.
मदन गोपाल मामाजी आज अभी शाम को अशफाक भाई की दुकान से इमरती लाना नहीं
भूलते. बाबूजी से सीखी आदत जो है. जब मदन मामाजी के बाबूजी जिंदा थे तो मदनजी के
लिए अशफाक भाई के अब्बा से रोजाना दो इमरती लाया करते थे. आज भी पूरे महुल्ले को
याद है जब मदन मामाजी की नौकरी स्टेट बैंक में लगी थी तो अशफाक भाई के अब्बा ने
पूरे ' प्रीतमजी के महुल्ले' में देसी घी की मिठाई बाटी थी. न कोई पराया था ना कोई
परायेपन की सोच… बस सब कुछ एक परिवार जैसा था. अब भी बहुत कुछ नहीं बदला. मदन
गोपाल मामाजी आज भी ओसवाल सूटिंग्स का मटमैला सफारी सुट पहने, साथ में VIP की अटेची लिए, हमेशा की
तरह वोही सवा-छे बजे अशफाक भाई की दुकान के सामने से निकलते हैं. बड़ी एतिहात से
एक साइड में अपना स्कूटर लगाते हैं और पाव भर इमरती लेते हैं. चाय के बाद एक इमरती
खाए बिना दाल-चावल की भूक नहीं लगती. आदत सी है.
यहाँ जूनून की परिभाषा
बनती है. अब शीला भाभी के शौपिंग का चस्का उतारे नहीं उतरता. उठाया अपना पर्स और
निकल पड़ी साइकिल रिक्शा पे दाना दन. तोल-मोल तो इनकी रगों में खून बनके दौड़ता है.
अब बेचारे रिक्शा वाले ने पंद्रह रुपये क्या मांग लिए इन्होने आधी घंटे का लेक्चर
पिला दिया. फिर बारह पे मनाने के बाद
इन्होने ये ताना देके छोड़ दिया " वो तो मैंने दस नहीं बोले वरना ये उस पे भी
मान जाता!"
दुकानों के आगे लगी
डोरियों पे लटके बंधेज के सलवार कुरते, शिफोन की साड़ी, बम्बई से आये दुपट्टे और
कोटन के शोर्ट कुर्ते...ये दुकाने किसी दुल्हन से कम नहीं हैं. पास लगे बड़े शोरूम
में चार पुतलों को 'फेनसी साड़ी' पहनाई गयी है. और सीताराम चायेवाले ने वही कोने
में अपनी थडी लगायी है. चार बजने को हैं और थोड़ी देर में चाये के साथ गरमा गरम दाल
के पकोड़े उतरेंगे. हुजूर ये चाय की थडी है और अपने साथ न कोई जात लती है और न कोई
भेद. हर तबके के शौक़ीन अभी यहाँ मख्खियों की तरह भिनभिनाते नज़र आयेंगे.
यहाँ कोई मसरूफियत भी
नहीं है. लड़कियों के कपड़ों की गली है और मोटरसाइकिल पे फालतू बैठे लफंगों की
चांदी. शाम से रात ज़रा जल्दी होती है और बाज़ारों में रोनक थोड़े ही देर रहती है.
आराम की ज़िन्दगी है और खरीदार के पास तंगी. तंगी न भी हो तो खर्च करने की आदत नहीं
है. दिल के खुले हैं पर मुट्ठि तंग है. मगर छोले - भठूरे, टिकिया चाट, गोल गप्पे
और प्याज़ की कचोरी पे क्या तंगी जी. खाइए लपालप. येही 'शुद्ध देसी घी में बने
पकवान’ तो खूबसूरती है छोटे
शहरों की.
छोटी गाड़ियों के रेलमपेल
में किशन मामा की मारुती अल्टो भी दनदना रही है. कल तक हीरो होंडा थी मगर अब
मारुती ले ली है आखिर एल.आइ.सी वालों ने इस्कीम जो निकली थी. अब उनका बेटा भी बड़ा
हो गया है. कॉम्मेर्स लेके बारव्हि तो पास कर ली और अब बी.कॉम में दाखिला ले लिया
है. कहता है एम्.बी.ए करेगा, मगर फ़िलहाल सी.ए का परचा भी भर दिया है.
अब मामाजी को दिन भर
स्वाति की शादी की फिकर खलती है. चौबीस की हो गयी है. एल.एल.बी भी करा दिया. जब तक
कोई अच्छा लड़का नहीं मिलता तब तक बी.एड का फॉर्म भरवा दिया है. एक बार शादी होगई, फिर वो जाने और उसका
पति.
मामीजी ने स्वाति के लिए अब हर सोमवार और गुरुवार घर पे कीर्तन रखवाना शुरू
कर दिया है. झांझर, ढोलक और चम्मचों के स्वर पूरे महल्ले में गूंजते हैं और बिमला
ताई लाउड इस्पिकर पे हर हर महादेव का जयकारा लगाती है.
खुश भगवन को किया जा रहा है
और नींद गुप्ता जी के पिताजी की खराब हो
रही है.
बडे मामाजी तो वैसे भी अब
रिटायर् होने वाले है. इस्लिये आज कल् रोज सुबह्
योगा करना शुरु कर दिया है. कम्युनिटी सेन्टर के गार्डेन मे चौहान साहेब् रोजाना
योगा कलासेस लगाते है और ‘स्टटे बेन्क योगा परिवार’ के बीस पचीस अफ्सर इकठे
हो जाते है. यहा ड्रेस्स् कोड जेसा कुछ नही है, हाफ् पेन्ट से कुर्ते पायजामे तक
सब कुछ चलता है. बस सब को सुबह् मिलना है और योगा खत्म होते ही मनमोहन सिन्घ जी कि एटोमिक पोलीसी पे गेहरा विचार विमर्श करना है. सवेरे की महक भी कमाल
की होती है. हलवाई की गरम कढायी से उतरते समोसे और भट्टि पे सुनहरी होती जलेबी
किसी जुगल बन्दी से कम नही. चोकी के मजदूरो की भीड भी यही लगती है. अगर आज कोइ
ठेकेदार लेके जायेगा तो शाम को चूल्हा जलेगा. तब तक उक्डू बैठे बैठे, बिडी पीते पीते
ही दोपहर बीत जायेगी.
केशव के स्कूल की बस खडी
है और डराईवर झल्ला के होर्न बजा रह है. ये रोज का है. शीला भाभी की आंख नही खुली
होगी. अब कोई आधी रात तक, रोते रोते टी.वी. पे सिरियल देखेगा तो आंख
खुलेगी कैसे? फिर कुसुमलता, यानी की भाभी की कामवाली बाइ के भी नखरे है. हों
भी क्यों ना? वो कामवाली बाई थोडे ही है, बल्कि घर का एक हिस्सा है. इस्लिये भाभी
ने गुडिया और् केशव् को बोल दिया है की कुसुम को आन्टी नही मौसी कह के बुलाओगे. और
आज मौसीजी काम पे नही आयि है तो शीला भाभी घुस्से में ससूराल वालों को कोस रहीं
है. अब इस में मदन मामाजी के
योगा का क्या दोश?
सवेरे की खामोशी भी अलग
है. यहां सब कुछ आराम से होता है. स्कूटी पे लडकीयां एक साथ कोलेज को निकलती है.
उनके पीछे स्कूटऱ ओऱ मोटरसाईकल पे लडके. इश्क का अन्दाज यहां पे
अलग है. हर कोई डिस्को नही जाता. कोलेज की पार्किन्ग पे बडे दबे अल्फाजो से ईजहार
होता है जो अक्सर 'फाल्तु बातों' के हन्ड्-ग्रेनडे से उडा दिया जाता है. हां पर
शादियों में जोडे मिलायी जम के होती है. महिला
संगीत पे महिने भर की तैयारी के बाद फिल्मी गानों पे नाचना किसी फिल्म-फेयर
परफोरमेन्स से कम नही. यहां हर चिज का एक तरीका
है. बडे खुल्ले मैंदान में शामीयाने के तले फेरे पडे जाते हैं. जरी की साडी में
झिलमीलाती आंटियां खूब जमती हैं मगर अंकलजी मात खा जाते हैं. वोहि खुद की शादी का
पुराना सुट छौडे नहीं छूटता.
वो बेचारा कितना भी कोशिश
कर ले, मगर बढते पेट को समेट नही पाता. फिर
कभी जीन्स के उपर शर्ट डाल लिया और ये कह के टरका दिया की "अजी करना क्या
हैं? लिफाफा पकडा के, खाना खा के वापस ही तो
आना है! “
शायद यहां के लोगों को
चीजें सन्जों के रखने की आदत सी है. पुरानी चादर अगर फट गयी तो थेले, पोछे के
कपडे, टीवी कवर और ना जाने क्या क्या बनाया जाता है. रात की रोटी सवेरे नाश्ते में
छौंक के खायी जाती हैं. यहां हर लम्हा एक उत्सव्
हैं. माल् जाना किसी जश्न मे जाने से कम नहीं. वोहि जरी की साडी में आप उन आंटीजी
को यहां तेल-मसाले खरीदते पायेन्गे. सारा परिवार एक साथ शोप्पिन्ग पे जाता है और
बडे तोल् मोल् के बाद चार कपडे खरीदता हैं.
हर शाम मिश्रा परिवार
कोमप्लान के डब्बे के साथ मुफ्त आयी फूटबाल लेके पास के बगीचे में जाता हैं.
यहां दरवाजे खुल्ले रखने
से कौशल्या मौसी का मन लगता है और पास की गुप्ता भाभी से बतिया के जी बेहेलता है.
केशव् के पुराने कपडों को अभी से स्वाति के बच्चों के लिये रख दिया है. मदन मामाजी
के शादी के बरतन आज भी नये जैसे हैं और छोटे मामाजी की शादी में किस ने कितने का
लिफाफा दिया था, इस्का हिसाब अभी भी मदन मामाजी कि पेटी में बन्द है.
अश्फाक् भाई कब के गुजर
गये मगर ईमर्ती अभी तक जिन्दा है. सुना है ये छोटे शेहेर में जादू टोटके बहुत होते
हैं. शायद ये सब भी उन में से ही एक है.